जाति-धर्म से ऊपर मानवता
सर्व-समाज एकता • हृदय की पुकार
॥ विचार-विमर्श ॥
▶ जाति-धर्म से ऊपर — मानवता के मूल्य
विचार का सार
प्रस्तुत वार्तालाप में जाति, धर्म, और संप्रदाय की सीमाओं से ऊपर उठकर ‘मानवता’ को सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्थापित करने का सन्देश है।
संत-परंपरा का मूल सन्देश यही है — मनुष्यता ही सर्वोपरि है। जाति-धर्म आवरण हैं, परंतु आत्मा एक है, विधाता एक है, और सेवा-भाव ही सच्ची पूजा है।
आस्था है तो रास्ता है — और यह रास्ता सबके लिए खुला है।
“जाति न पूछो साधु की,
पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तरवार का,
पड़ी रहन दो म्यान॥”— संत कबीर
पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तरवार का,
पड़ी रहन दो म्यान॥”— संत कबीर
“एक ही ज्योति, एक ही प्राण —
सबमें वही विधाता विराजमान।
मानवता ही धर्म, सेवा ही पूजा।”
सबमें वही विधाता विराजमान।
मानवता ही धर्म, सेवा ही पूजा।”
॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥॥ जय सदगुरु सत्यनाथ ॥
